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वित्तीय समावेशन- सिंडिकेटबैंक, का एक परिदृश्य

 

विश्‍वभर में सभी विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाएं गरीबी को नियंत्रित करने के लिए नए तरीके और उपाय अपना रहे हैं। वे हर नागरिक को इस आर्थिक विकास में शामिल करना चाहते हैं ताकि कोई भी व्‍यक्ति उचित या मर्यादित तरीके से जीने के अधिकार से वंचित न हो। हालांकि, यह कार्य चुनौतीपूर्ण हो गया है और उन के पास सीमित संसाधन होने के कारण, यह मिशन इन देशों के लिए कठिन कार्य बन गया है। भारत सरकार का, गरीबों और पिछड़े वर्गों का, विशेषकर गाँवों, वित्‍तीयन की पहुँच को बढ़ाने के कार्य  करने का लंबा इतिहास है। भारत सरकार, इन्‍हें मज़बूत भारत के निर्माण में लेना चाहती है ताकि वे नए आर्थिक विश्‍व की व्‍यवस्‍था का हिस्‍सा तथा साझेदार बनें। यह प्रयास अब हर किसी को नज़र आ रहा है। आज भारत एक मज़बूत अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में उभरा है।
वर्ष 1969 में कुछ प्रमुख निजी क्षेत्र के बैंकों का राष्‍ट्रीयकरण किया गया था, वह इस दिशा में उठाया गया पहला कदम है। इस संबंध में, अलग बैंकों यानी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्‍थापना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि  है क्‍योंकि ये एक केंद्रित दृष्टिकोण के लिए एक सीमित सेवा क्षेत्र की ज़रुरतों को पूरा करते हैं। फिर भी, बढ़ती जनसंख्‍या इस पहल पर दबाव डाल रही है। सरकार ने, इस सेवा को बनाए रखने हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं के विस्‍तार पर विशेष जो़र दे रही है।
गरीबों की, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, ऋण आवश्‍यकताओं को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया और वाणिज्यिक बैंकों से अपेक्षित है कि वे अपने कुल ऋण में से कम से कम 40% ऋण इस क्षेत्र को दें । अधिक से अधिक लोगों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराने की दृष्टि से तथा सहकारी उद्यमों को प्रोत्‍साहन देने हेतु सहकारी बैंकों की स्‍थापना की गई। इन पहसे प्रोत्‍साहजनक परिणाम मिलने के बावजूद, बहुत से लोगों को इसका लाभ प्राप्त नहीं हुआ। इन लाखों वंचित लोगों तक पहुँचने के लिए “स्‍वयं  सहायता समूह” की स्थापना की गयी, ताकि इस योजना के अंतर्गत माइक्रो वित्तीयन की पहल की जा सके। इससे प्रोत्‍साहित होकर हमने अब यह तय किया है कि हम जनता को समावेशी बैंकिंग के अंतर्गत  लाकर इन्‍हें भी समग्र विकास में शामिल करेंगे।
वित्‍तीय समावेशन की नई अवधारणा: सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हाल में हुए विकास ने पारंपरिक बैंकिंग को सरल, आसान और कभी भी–कहीं भी  बैंकिंग को, नवोन्‍वेषी प्रणालियां जैसे एटीएम, प्लास्टिक मुद्रा के माध्‍यम से नकदरहित बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग, मोबइल बैंकिंग, ऑनलाइल नकद अंतरण, आदि को बढ़ावा दे रहा है। पर, तकनीक बहुत कीमती है और अब तक यह शहरी लोगों तक ही सीमित है जो, इसकी लागत का वहन कर सकते हैं। अब तक ग्रामीण जनता तक जो भी उपलब्ध कराया गया है उसे अल्‍प ही कहा जा सकता है। इस नई सहस्राब्दि में, भारत ने संप्रेषण तकनीक में जबरदस्त विकास किया है। पिछले वर्ष की वैश्विक मंदी के बावजूद, इस क्षेत्र  में इतनी प्रगति हुई है कि अब संप्रेषण प्रौद्योगिकी शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक पहुँच गयी है तथा यह और अधिक क्षेत्रों को कवर कर रहा है। इस तरह के विस्तार के साथ, यह सस्ती हो गई है। इस वृद्धि के साथ आम जनता तक पहुँचने का एक नया चैनल खुल गया है।
प्रौद्योगिकी और संसूचना के संयोजन से संचालित की जानेवाली वित्‍तीय समावेशन पहल के प्रायोगिक  कार्यान्वयन में जबरदस्त सफलता हासिल हुई है। सरकार द्वारा प्रारंभ की गई शाखारहित बैंकिंग में,  किसी व्‍यक्ति द्वारा बैंक शाखा पहुँचने से पहले ही, बैंक उसकी देहलीज़ पर पहुँच जाता है। संस्‍थानों/ गैर-सरकारी संस्‍थानों, माइक्रो–वित्‍त निकायों, सहकारी सोसाइटियों, किराने की दुकानें, सार्वजनिक टेलीफोन बूथ संचालकों और व्यक्तियों को वाणिज्यिक बैंक के सहूलियतकार/ व्‍यापारिक संवाददाता के रूप में नियुक्‍त किया जाता है और इन्‍हें छोटी रकम की जमाराशियां, कुछ ऋणों की वसूली और वितरण, अन्‍य  वित्‍तीय उत्‍पाद जैसे बीमा, पेंशन और म्‍यूचुअल फंड जैसे वित्तीय उत्पादों की बिक्री और ऑनलाइल या ऑफलाइन के माध्‍यम से स्‍मार्टकार्ड आधारित बायो-मेट्रिक समर्थित लेनदेन से छोटे प्रेषण और भुगतान संभालनें के लिए प्राधिकृत किया जाता है। यह किफायती योजना है जिसमें कम निवेश लगता है और इसको इस प्रकार से योजनाबद्ध किया गया है कि यह आने वाले वर्षों में पूरी जनता को कवर करेगी। जनता को बैंकिंग पैनल उपलब्ध कराने की योजना एक महत्वपूर्ण कदम है। फिर भी, हमें बैठकर यह समीक्षा करने की ज़रूरत है कि क्‍या हम वास्तव में वंचित वर्ग की जरूरतों को पूरा कर रहे है या नहीं,   क्‍या हमारे द्वारा शहरी लोगों को दिए जाने वाले उत्पाद और सेवाएं उनकी जरुरतों के अनुरूप हैं या नहीं  क्या वर्तमान नियम और विनियमावलियां, जिनमें वैधानिक भी शामिल हैं, उनकी आवश्‍यकताओं की पूर्ति करता है या नहीं। हर कोई अपना खुद का व्यवसाय शुरू नहीं कर सकता है और स्थायी आय अर्जित नहीं कर सकता है। ऐसे लोगों को छोटी राशि की ऋण सुविधा मंजूर करने से कोई लाभ नहीं होगा। फिर भी, हमें समावेशी विकास के लिए ऐसे व्यक्तियों को ऋण का विस्तार करना चाहिए। हमें उत्‍पाद या उत्‍पादों का ऐसा पैकेज प्रारंभ करना चाहिए जो लोगों की बचत, ऋण और बीमा जैसी ज़रूरतों का ख्‍़याल रखते हैं। वास्‍तव में, बचत के उत्‍पाद ऐसे होने चाहिए कि वे गरीबों की विशिष्ट आवश्‍यकताओं की पूर्ति कर सके।  कुछ गरीब लोग अपनी रोज़ी रोटी को लिए धन कमाने में असमर्थ है, ऐसी स्थिति में उनसे बचत की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। वे प्रतिदिन के हिसाब से बसर करते हैं। इसलिए, हमें पश्चस्तरीय तकनीकी की मदद से ब्‍याज की कुछ प्रतिशतता के अलावा, अन्य कुछ प्रोत्साहन के बदले में छोटी बचत जुटाना चाहिए। याद रहे, पारंपरिक तौर पर बचत, अतिरिक्त आय से जुड़ा हुआ है, जो गरीब लोग नहीं जुटा पा  रहे हैं ! अगर हम सभी ग़रीबों को शामिल करना चाहते हैं तो हमें ग़रीबों के संबंध में बचत हेतु नए सिरे से सोचना होगा।
ग़रीबों और वंचित वर्गों के लिए नए तरीके और नए बचत उत्पाद की शुरुआत करने के लिए नए मार्ग और  साधन अपनाने का समय आ गया है। उसी तरह, उनकी ऋण आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए, बचत  संबद्ध वित्‍तीय माडल को अपना सकते हैं। यह सरल और आसान होना चाहिए और हिताधिकारियों के लिए ऋण सीमा की गारंटी हो, जो सरल नियमों और शर्तों के पालन के अधीन हो। इसके अलावा आर्थिक रूप से अपवर्जित लोगों के लिए उचित माइक्रो-बीमा उत्‍पादों को विकसित करने की आवश्‍यकता है। ग़रीब जनता, विशेषकर ग्रामीण जनता में निरक्षरता की प्रतिशतता बहुत अधिक है। इससे उन्‍हें मार्गदर्शन के लिए  पढ़े-लिखे लोगों पर निर्भर होना पड़ता है। इसलिए, साक्षरता दर में वृद्धि लाने की आवश्‍यकता है, उन्‍हें सशक्‍त करने के लिए उन्‍हें शिक्षित करना है और, वित्तीय साक्षरता और परामर्श केन्द्रों के माध्यम से भी उन्हें शिक्षित करने की जरूरत है। उन्‍हें मछली खिलाने के बजाय मछली पकड़ने की कला सीखानी चाहिए। इतनी विशाल जनसंख्‍या तक पहुचँना केवल बैंकों या सरकारी ऐजेंसियों द्वारा संभव नहीं होगा।

इसका अंतर्निहित तथ्य यह है कि ऐसे प्रयासों को बैंकों की सक्रिय भागीदारी और उद्योग के समर्थन के साथ भारत सरकार द्वारा संचालित किया जाना चाहिए। उद्योगों से अपेक्षित है कि वे नई तकनीकीवाले उत्पादों को बाजार में लाएं जैसे, अल्प लागतवाले हाथ से संचालित मशीनों और खिफायती स्मार्ट कार्ड इत्यादि और बेतारवाले गाँवों में संसूचना सेवाएं उपलब्ध करने के लिए अधिक निवेश करें। बैंकों को चाहिए कि वे ऐसे बैंकरहित क्षेत्रों में अपने प्रतिनिधियों को भेजकर ग्रामीण जनता को शामिल करने में सक्रिय भूमिेका निभाए। देश ने इसे अपनी कार्ययूची के शीर्ष में रखा है। सही गति और कवरेज में तेज़ी लाने के लिए, भुगतान हेतु मोबाइल फोन के प्रयोग, तृतीय पक्षकार कारोबार प्रतिनिधि और अपने ग्राहक को जानिए की शर्तों में छूट, जैसे नियामकों में छूट और पहल का प्रारंभ किया गया है। शाखारहित बैंकिंग की अवधारणा वित्‍तीय समावेशन में तेजी लाने में सहायक होगा। इस कवरेज की वृद्धि के साथ हम निश्चित रूप से निर्धारित समय सीमा में वांछित लक्ष्यों को प्राप्‍त करने के लिए कुछ परिवर्तन और सुधार कर सकेंगे।

 

 

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